दबा हुआ सत्य उजागर होने से अभिव्यक्ति स्वतंत्रता वाले शोरगुल कर रहे हैं ! – प्रधानमंत्री

द कश्मीर फाइल्स’ सिनेमा के माध्यम से प्रधानमंत्री की हिन्दू विरोधियों पर कठोर टिप्पणी

नई दिल्ली – ‘द कश्मीर फाइल्स’ जैसे सिनेमा बनने चाहिए । ऐसे सिनेमा के माध्यम से सत्य जनता के सामने आता रहता है । पिछले अनेक दशकों से जो सत्य छुपाने का प्रयास हुआ, उसे सामने लाया जा रहा है । इस कारण जो लोग सत्य छुपाने का प्रयास कर रहे हैं, वे आज विरोध कर रहे हैं । हमेशा ही अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का झंडा लेकर घूमने वाली ‘जमात’ पिछले ५-६ दिनों से उलझे हुए हैं, ऐसा हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिन्दू विरोधियों पर किया है । वह भाजपा की संसदीय बैठक में बोल रहे थे । देश में कुछ स्थानों पर ‘द कश्मीर फाइल्स’ सिनेमा प्रदर्शित करने से विवाद निर्माण हो रहा है । इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने उपरोक्त विधान किए ।

(सौजन्य : रिपब्लिक टीवी)

प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि,

१. इस सिनेमा के तथ्य और कला पर चर्चा करने की बजाय इस सिनेमा को नकारने की मोहिम चलाई जा रही है ।

२. सिनेमा बनाने वालों को जो सत्य दिखा, वो दिखाने का प्रयास उन्होंने किया ।

३. सिनेमा यह मेरा विषय नहीं, मेरा विषय है , सत्य देश के सामने लाना, यह देश के भले के लिए होता है । उसके विविध पहलू होते हैं । एक को एक बात दिखती है, तो दूसरे को दूसरी । किसी एक को लगता है कि, यह सिनेमा योग्य नहीं, तो उसने दूसरा बनाना चाहिए; लेकिन ऐसे लोगों को कष्ट हो रहा है कि, जिन्होंने सत्य इतने दिनों तक छुपाकर रखा था और अब यह तथ्यों सहित सामने लाया जा रहा है । कोई तो परिश्रम करके प्रयास कर रहा है । ऐसे समय सत्य के लिए जीने वाले लोगों का दायित्व है कि, उन्हें सत्य के पीछे खडे रहना चाहिए । यह दायित्व प्रत्येक व्यक्ति को निभाना चाहिए ।

आपातकाल जैसी बडी घटना पर किसी ने सिनेमा क्यों नहीं बनाया ?

मोदी ने आगे कहा कि, देश में आपातकाल की इतनी बडी घटना होने पर भी इस पर अभीतक किसी ने भी वास्तविकता दिखाने वाला सिनेमा नहीं बनाया । सत्य दबाने का सतत् प्रयास किया गया ।

विभाजन की सत्यता पर आधारित सिनेमा क्यों नही बनाया गया ?

मोदी ने भारत के विभाजन के विषय में कहा कि, जब हम विभाजन के समय हुए नरसंहार की याद रखने के लिए १४ अगस्त यह दिन ‘विभाजन की भीषणता’ के रुप में घोषित किया, तब यह बहुतों को बुरा लगा । भारत के विभाजन की वास्तविकता दिखाने वाला सिनेमा अभी तक क्यों नहीं बना ? कभी कभी ऐसी वास्तविकता से सीखने को मिलता है । देश ऐसी बातों को कैसे भूल सकता है ?