मकर संक्रांति (१४ जनवरी)

तिथि

इस दिन सूर्य का मकर राशि में संक्रमण होता है । सूर्यभ्रमण के कारण होनेवाले अंतर की पूर्ति करने हेतु प्रत्येक अस्सी वर्ष में संक्रांति का दिन एक दिन आगे बढ जाता है । आजकल संक्रांति १४ जनवरी को पडती है ।

इतिहास : संक्रांति को देवता माना गया है । ऐसी कथा प्रचलित है कि संक्रांति ने संकरासुर दानव का वध किया ।

महत्त्व : इस दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक वातावरण अधिक चैतन्यमय होता है । साधना करनेवाले को इस चैतन्य का लाभ होता है ।

त्योहार मनाने की पद्धति

१. ‘मकर संक्रांति पर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक पुण्यकाल रहता है । इस काल में तीर्थस्नान का विशेष महत्त्व है । गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियों के किनारे स्थित क्षेत्र में स्नान करनेवाले को महापुण्य का लाभ मिलता है ।’

२. मकर संक्रांति से रथसप्तमी तक का काल पर्वकाल होता है । इस पर्वकाल में किया गया दान एवं पुण्यकर्म विशेष फलदायी होता है ।

‘नए बर्तन, वस्त्र, अन्न, तिल, तिलपात्र, गुड, गाय, घोडा, स्वर्ण अथवा भूमि का यथाशक्ति दान करें । इस दिन सुहागिनें दान करती हैं । कुछ पदार्थ वे कुमारिकाओं से दान करवाती हैं और उन्हें तिलगुड देती हैं ।’ सुहागिनेें जो हलदी-कुमकुम का दान देती हैं, उसे ‘उपायन देना’ कहते हैं ।

‘उपायन देना’ अर्थात तन, मन एवं धन से दूसरे जीव में विद्यमान देवत्व की शरण में जाना । संक्रांति-काल साधना के लिए पोषक होता है । अतएव इस काल में दिए जानेवाले उपायन सेे देवता की कृपा होती है और जीव को इच्छित फलप्राप्ति होती है ।

उपायन में क्या दें ? : आजकल साबुन, प्लास्टिक की वस्तुएं जैसी अधार्मिक सामग्री उपायन देने की अनुचित प्रथा है । इन वस्तुओं की अपेक्षा सौभाग्य की वस्तु, उदबत्ती (अगरबत्ती), उबटन, धार्मिक ग्रंथ, पोथी, देवताओं के चित्र जैसी अध्यात्म के लिए पूरक वस्तुएं उपायन स्वरूप देनी चाहिए ।

मटकी : ‘संक्राति के त्योहार में ‘मटकी’ आवश्यक है । मटकियों को हलदी-कुमकुम से स्पर्शित उंगलियां लगाकर धागा बांधते हैं । मटकियों के भीतर गाजर, बेर, गन्ने के टुकडे, मूंगफली, रुई, काले चने, तिलगुड, हलदी-कुमकुम आदि भरते हैं। रंगोली सजाकर पीढे पर पांच मटकियां रख पूजा करते हैं । तीन मटकियां सुहागिनों को उपायन देते हैं, एक मटकी तुलसी को व एक अपने लिए रखते हैं ।’

तिल का उपयोग : संक्रांति पर तिल का अनेक ढंग से उपयोग करते हैं, उदा. तिल युक्त जल से स्नान कर तिल के लड्डू खाना एवं दूसरों को देना, ब्राह्मणों को तिलदान, शिवमंदिर में तिल के तेल से दीप जलाना, पितृश्राद्ध करना (इसमें तिलांजलि देते हैं) ।

निषेध

पर्वकाल में कठोर बोलना, वृक्ष एवं घास काटना तथा कामविषय सेवन करना, ये कृत्य सख्त वर्जित हैं ।’

पतंग न उडाएं ! : वर्तमान में राष्ट्र एवं धर्म संकट में होते हुए मनोरंजन हेतु पतंग उडाना, अनुचित है । पतंग उडाने के समय का उपयोग राष्ट्र के विकास हेतु करें, तो राष्ट्र शीघ्र प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा और साधना एवं धर्मकार्य हेतु समय का सदुपयोग करने से अपने साथ समाज का भी कल्याण होगा ।

(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ – ‘त्योहार मनाने की उचित पद्धतियां एवं शास्त्र’)